Consciousness

Sadhu Vishal Mishra के अनुसार, मनुष्य की चेतना का स्तर इस बात से पहचाना जाता है कि उसकी सोच शरीर के किस केंद्र से संचालित हो रही है। जो व्यक्ति केवल छाती के नीचे की चेतना से जीता है, वह जीवन को केवल पेट, डर, लालच, तुलना और रोज़मर्रा की मजबूरियों तक सीमित कर देता है। वह मेहनत करता है, काम करता है, जीवन काट देता है, लेकिन भीतर से उसका मन कभी प्रसन्न नहीं होता। ऐसे व्यक्ति को आप किसी भी युग में रख दीजिए—सतयुग, द्वापर, त्रेता या कलियुग—उसकी आंतरिक स्थिति वही रहेगी, क्योंकि युग नहीं, चेतना उसका जीवन तय करती है।

इसके विपरीत, जो लोग छाती से ऊपर की चेतना में जीते हैं, यानी जिनकी सोच हृदय, विवेक और दृष्टि के स्तर पर काम करती है, वे केवल अपने लिए नहीं, समाज के कल्याण के लिए सोचते हैं। उनका जीवन उद्देश्य-आधारित होता है, सेवा-आधारित होता है। ऐसे लोग किसी भी युग में हों, वे अपने भीतर संतुलन और प्रसन्नता बनाए रख सकते हैं, क्योंकि उनका आनंद बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होता।

इस दर्शन का मूल बिंदु यह है कि कलियुग में आनंद पाने के लिए बड़े त्याग या सन्यास की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है केवल अपनी ऊर्जा और चेतना की दिशा बदलने की। जब मनुष्य अपनी कुंडलिनी शक्ति को नीचे के केंद्रों से उठाकर ऊपर की ओर—हृदय, कंठ और मस्तिष्क की ओर—ले जाता है, तब उसका अनुभव बदलता है। तब जीवन बोझ नहीं रहता, बल्कि एक जिम्मेदार और अर्थपूर्ण यात्रा बन जाता है।

और यह परिवर्तन किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि ध्यान, सही मार्गदर्शन और निरंतर सजगता से संभव होता है। सही मार्ग पर किया गया ध्यान व्यक्ति को भीतर से ऊँचा उठाता है, बिना किसी बड़े बलिदान के, बिना दुनिया छोड़े।

संक्षेप में, समस्या युग की नहीं है—समस्या चेतना के स्तर की है। जब चेतना ऊपर उठती है, तो कलियुग भी आनंद का द्वार बन सकता है।

“युग नहीं, चेतना जीवन तय करती है”

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